मुंबई. प्रसिद्ध निर्देशक बासु चटर्जी के निधन के बाद अभिनेता राजू श्रेष्ठ उर्फ मास्टर राजू ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ काम करने का अपना अनुभव हमारे साथ शेयर किया। उन्होंने खुद को इस बारे में भाग्यशाली बताया कि उन्हें बासु दा के साथ काम करने का मौका मिला।

राजू ने कहा, ‘मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं, जो मैंने बासु दा के साथ काम किया है। उनके साथ मेरा एक्सपीरियंस सबसे अच्छा रहा है। वो इसलिए कि उनमें वो कला थी कि एक्टर से बहुत सहजता से काम निकलवाते थे। कैमरा छुपाकर रख देते थे और एक्टर्स का शॉट ले लेते थे। मैंने अपने पूरे करियर में 250-300 फिल्में की हैं। उनमें से सबसे ज्यादा यादगार अनुभव बासु दा की फिल्मों के साथ रहे हैं। बासु दा के साथ मैंने 4 फिल्में की हैं।’

एक शेड्यूल में पूरी कर लेते थे फिल्में

आगे राजू ने बताया, ‘मैंने उनके साथ ‘खट्टा-मीठा’ की, जो सिंगल शेड्यूल में पंचगनी में शूट हो गई थी। ‘चितचोर’ के साथ भी ऐसा ही था। वह भी एक ही शेड्यूल में पूरी हो गई थी। इसी तरह ‘चक्रव्यूह’ फिल्म भी हम लोगों ने दादर में शिवाजी पार्क स्थित बंगले में एक शेड्यूल में पूरी कर ली थी। उसी बंगले में ‘हमारी बहू अलका’ भी शूट की गई। इन सभी फिल्मों में मैंने पाया कि हंसते-खेलते हंसी मजाक में शूटिंग हो जाया करती थी।

‘बासु दा का काम एफर्टलेस लगता था’

‘बासु दा ही एक ऐसे डायरेक्टर थे, जो मुंबई की बेस्ट की बसों में लव स्टोरी बना देते थे। यह काम आज की तारीख में बड़े से बड़ा डायरेक्टर भी नहीं कर पाएगा। इतने कठिन माहौल में इतनी प्यारी लव स्टोरी पिरो देना। उनकी फिल्मों में लोकल ट्रेन में धक्के खाते हुए बड़े प्यार से लव स्टोरी बन जाती थी। वो कैमरा छिपाकर कैंडिड शॉट लेकर वैसा सबकुछ कर लेते थे। ऐसा आज भी होता है, लेकिन आज इस तरह से फिल्म को शूट करें तो एफर्ट दिखता है मगर बासु दा की फिल्मों में यह सब एफर्टलेस लगता था। वह चाहे करण जौहर की ग्लॉसी फिल्म हो या अनुराग कश्यप की डार्क जोनर की फिल्म। आप महसूस करते हैं कि आपको इरादतन खूबसूरती या फिर गंदगी दिखाई जा रही है लेकिन बासु दा की फिल्मों में ऐसा लगता ही नहीं था।’

‘बंगलो में शूट होते थे फ्लैट के सीन’

‘उनकी फिल्मों में फ्लैट होता था। मिडिल क्लास फैमिली की कहानी होती थी। हालांकि जो दो फिल्में हमने दादर शिवाजी पार्क में शूट की, वह तो बंगलो था। ‘खट्टा मीठा’ फिल्म का जो पॉपुलर गाना देवेन वर्मा पर था, वह भी वहीं फिल्माया गया था। एक बात यह भी है कि फ्लैट में एज-अ-फ्लैट शूटिंग नहीं की जा सकती। ऋषिकेश दा की फिल्मों की बात भी करें तो उनकी फिल्में भी बंगलों में शूट होती थी या फिर सेट लगते थे। चाहे आप बावर्ची, नमक हराम, आनंद, गुड्डी किसी भी फिल्म को देख लें। तो या तो वो बंगलो होता था या फिर सेट लगाए जाते थे। वो इसलिए कि आप किसी रियल फ्लैट में कैमरा, मॉनीटर, लाइट सारा तामझाम लेकर शूट नहीं कर सकते।’

‘बासु दा के समझाने पर ‘चितचोर’ की थी’

राजू ने बताया, ‘अच्छा मजे की बात देखिए कि ‘चितचोर’ के लिए जब मुझे राजश्री प्रोडक्शन से कॉल आया था तो उस वक्त मेरा गोल्डन पीरियड चल रहा था। उस दौरान में एक दिन में तीन-तीन फिल्मों की शूटिंग किया करता था। तो राजश्री प्रोडक्शन उसके निर्माता थे और वे उस तरह की फिल्में नहीं बनाते थे, जिस तरह की फिल्में मैं किया करता था। मैं उस दौर में प्रमोद चक्रवर्ती, प्रकाश मेहरा, बच्चन साहब और जितेंद्र के साथ कमर्शियल फिल्में करता था। राजश्री प्रोडक्शन की तरफ से मुझे कॉल आया था तो मैंने यह कहकर मना कर दिया था कि भाई मैं तो इतनी फीस लेता हूं। इस पर राजश्री वालों ने कहा भी कि इतनी तो हम लोग अपने हीरो को भी नहीं देते हैं। लेकिन जब बाद में बासु दा ने मुझे समझाया कि यह अलग तरह का रोल होगा, तब जाकर मैं उस फिल्म का हिस्सा बना और संयोग देखिए कि उस फिल्म के लिए मुझे नेशनल अवार्ड मिला था।’

सेट पर क्रिकेट खिलवाकर बेस्ट शॉट निकलवाते थे

‘मसाला फिल्मों के उस दौर में बासु दा की फिल्मों की एक लॉयल ऑडियंस थी, जो सिनेमाघरों में जाकर उस तरह की दुनिया देखा करती थी। उनके सेट पर किसी तरह का कोई वर्गीकरण नहीं होता था। ‘खट्टा-मीठा’ फिल्म की शूटिंग के दौरान हम लोग सेट पर क्रिकेट खेलते थे। होता यह था कि जब क्रिकेट से फ्री हो जाओ तब जाओ और शॉट दे आओ, अपना सीन कर लो जाकर। मुझे याद है, मैं बैटिंग कर रहा था, बासु दा बॉलिंग कर रहे थे और फिल्म के प्रोड्यूसर गुल आनंद फील्डिंग कर रहे थे। मेरा शॉट रेडी था तो एक असिस्टेंट आया बुलाने के लिए तो बासु दा ने असिस्टेंट को कहा रुको वो बैटिंग कर रहा है, इसके बाद शॉट देने आएगा। पर उसके बाद आप देखिए कि उस फिल्म में उन्होंने जो मुझसे काम निकलवाया वह कमाल का था।

देर से पहुंचता था तो चंपी करवाते थे

राजू ने आखिरी में कहा, ‘एक ताजगी लेकर आते थे वे, वैसा ही जादू गुलजार साहब भी अपनी फिल्म में लाते थे। तभी मुझे फिल्म ‘किताब’ के लिए फिल्म फेयर अवार्ड मिला था जो गुलजार भाई ने डायरेक्ट की थी और नेशनल अवार्ड मिला ‘चितचोर’ के लिए जो बासु दा ने डायरेक्ट की थी। वे कमाल के इंसान थे, हां अगर मैं सेट पर देर से पहुंचता था तो मुझसे चंपी भी करवाते थे। मैंने उनकी बिटिया के साथ एक सीरियल भी किया आगे चलकर। उनकी बिटिया ने दुलाल गुहा के बेटे से शादी की।’ (जैसा अमित कर्ण को बताया)